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जानें पौधों के विकास के लिए जरुरी पोषक तत्व के बारे में।

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जिस प्रकार इंसानो को संतुलित आहार, पोषक तत्वों की जरुरत होती है उसी प्रकार पौधों को भी अपनी वृद्धि, प्रजनन और विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की जरुरत होती है। अगर पौधों को वो जरुरी पोषक तत्त्व न मिलें तो उनकी वृद्धि रुक जाती है। अगर वो जरुरी पोषक तत्व पौधों को निश्चित अवधि तक न मिलें तो पौधों की मृत्यु भी हो सकती है। 

पौधे भूमि से जल और खनिज-लवण शोषित करके वायु से कार्बन डाई-ऑक्साइड प्राप्त करके सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं। पौधों को 17 तत्वों की आवश्यकता होती है, जिनके बिना पौधों की वृद्धि-विकास और प्रजनन आदि क्रियाएँ संभव नहीं हैं लेकिन इनमें से कुछ मुख्य तत्त्व इस प्रकार है। 

कार्बन 

हाइड्रोजन 

ऑक्सीजन 

नाइट्रोजन 

फास्फोरस 

पोटाश 

इनमें से प्रथम 3 तत्त्व पौधे वायुमंडल से ग्रहण कर लेते हैं। 

पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है –

मुख्य पोषक तत्व :- नाइटोजन, फॉस्फोरस, पोटाश 

गौण पोषक तत्व :- कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर 

सूक्ष्म पोषक तत्त्व :- ज़िंक, मैग्नीज, बोरान 

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नाइट्रोजन 

  • नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है, जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है। यह पर्ण हरित के निर्माण में भी भाग लेती है। नाइटोजन का पौधों की विकास और वृद्धि में बहुत योगदान होता है। 
  • यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है। 
  • वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है। 
  • अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाता है।   
  • यह दानों के बनने में मदद करता है। 
  • सभी जीवित ऊतकों यानि जड़, तना, पत्ती की वृद्धि और विकास में सहायक है। 
  • क्लोरोफिल, प्रोटोप्लाज्मा प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों का एक महत्वपूर्ण अवयव है। 
  • पत्ती वाली सब्जियों की गुणवत्ता में सुधार करता है। 

नाइट्रोजन – कमी के लक्षण 

  • पौधों में प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना। निचली पत्तियाँ सड़ने लगती हैं, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं। 
  • पौधे की बढ़वार का रुकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना। 
  • फल वाले वृक्षों से फलों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना। 

फॉस्फोरस 

  • फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन शीघ्र होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स वफाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है। 
  • यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा मैट्रोकांड्रिया का मुख्य अवयव है। 
  • फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। 
  • फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा सुदृढ़ होती हैं। पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है। 

फास्फोरस – कमी के लक्षण  

  • पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्का बैगनी या भूरा हो जाता है। फॉस्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी(निचली) पत्तियों पर दिखते हैं। 
  • दाल वाली फसलों में पत्तियाँ नीले हरे रंग की हो जाती हैं। 
  • पौधों की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होता है। कभी – कभी जड़ें सूख भी जाती हैं। 
  • अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना। फल व बीज का निर्माण सही न होना। 

पोटेशियम 

  • जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है। 
  • स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है। 
  • अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलों की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है। सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है। मिटटी में नाइट्रोजन के कुप्रभाव को कम करता है। 
  • एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। 
  • ठण्डे और बादलयुक्त मौसम में पौधों द्वारा प्रकाश के उपयोग में वृद्धि करता है ,जिससे पौधों में ठंडक और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है। 

पोटैशियम – कमी के लक्षण 

  • पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले ही गिर जाती हैं। 
  • पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़ते हैं। 
  • इसकी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले व किनारों पर दाने कम पड़ते हैं। आलू के कंद छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है। 
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जानें चीकू की खेती करने का बेहतरीन तरीका और फायदे।

Sapota | Sapota Tree Planting Information
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चीकू (Chiku) या सपोटा ( सपोटा ), सैपोटेसी कुल का पौधा है। भारत में चीकू अमेरिका के उष्ण कटिबंधीय भाग से लाया गया था। चीकू का पक्का हुआ फल स्वादिष्ट होता है। चीकू के फलों का छिलका मोटा व भूरे रंग का होता है। इसका फल छोटे आकार का होता है जिसमें 3 – 5 काले चमकदार बीज होते हैं।

 चीकू की खेती फल उत्पादन तथा लेटेक्स उत्पादन के लिए की जाती है। चीकू के लेटेक्स का उपयोग चुइंगम तैयार करने के लिए किया जाता है। भारत में चीकू की खेती मुख्यतः फलों के लिए की जाती है। चीकू फल का प्रयोग खाने के साथ – साथ जैम व जैली आदि बनाने में किया जाता है।

चीकू फल के लाभ 

चीकू में विटामिन A, ग्लूकोज, टैनिन, जैसे तत्व पाये जाते हैं जो कब्ज, एनीमिया, तनाव, बवासीर और जख्म को ठीक करने के लिए सहायक होते हैं। चीकू में कुछ खास तत्व पाए जाते हैं जो श्वसन तंत्र से कफ और बलगम निकाल कर पुरानी खाँसी में राहत देता है। चीकू में लेटेक्स अच्छी मात्रा में पाया जाता है इसीलिए यह दांत की कैविटी को भरने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। 

चीकू की व्यावसायिक खेती 

भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों में इसकी बड़े क्षेत्रफल में खेती की जाती है। इस फल को उपजाने के लिए बहुत ज्यादा सिंचाई और अन्य रख – रखाव की जरुरत नहीं है। थोड़ी खाद और बहुत कम पानी से ही इसके पेंड फलने-फूलने लगते हैं।

भूमि व जलवायु 

इसकी खेती के लिए गर्म व नम मौसम की आवश्यकता होती है। गर्मी में इसके लिए उचित पानी की व्यवस्था का होना भी आवश्यक है। इसे मिटटी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छे निकास वाली गहरी जलोढ़, रेतीली दोमट और काली मिटटी चीकू की खेती के लिए उत्तम रहती है। चीकू की खेती के लिए मिटटी की PH मान 6 – 8 उपयुक्त होती है। चिकनी मिटटी और कैल्शियम की उच्च मात्रा युक्त मिटटी में इसकी खेती न करें।

चीकू का प्रवर्धन

चीकू की व्यावसायिक खेती के लिए शीर्ष कलम तथा भेंट कलम विधि द्वारा पौधा तैयार किया जाता है। पौधा तैयार करने का सबसे उपयुक्त समय मार्च – अप्रैल है। चीकू लगाने का सबसे उपयुक्त समय वर्षा ऋतु है।

पौधे की रोपाई 

चीकू की खेती के लिए, अच्छी तरह से तैयार जमीन की आवश्यकता होती है। मिटटी को भुरभुरा करने के लिए 2 – 3 बार जोताई करके जमीन को समतल करें। रोपाई के लिए गर्मी के दिनों में ही 7 – 8 मीटर की दूरी पर वर्गाकार विधि से 90 x 90 सेमी आकार के गड्डे तैयार कर लेना चाहिए। 
गड्ढा भरते समय मिटटी के साथ लगभग 30 किलो गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद, 2 किलो करंज की खली एवं 5 – 7 किलो हड्डी का चुरा प्रत्येक गड्डे के दल में मिलाकर भर देना चाहिए। एक बरसात के बाद पौधे को गड्डे के बीचों – बीच लगा दें तथा रोपने के बाद चारों ओर की मिटटी अच्छी तरह दबा कर थावला बना दें।

चीकू के पौधे को शुरुआत में दो – तीन साल तक विशेष रख – रखाव की जरुरत होती है।

चीकू की किस्में

देश में चीकू की कई किस्में प्रचलित हैं। उत्तम किस्मों के फल बड़े, छिलके पतले, चिकने, गुदा मीठा और मुलायम होता है। क्रिकेट बॉल, काली पत्ती, भूरी पत्ती, P K M – 1, D S H – 2 झुमकिया आदि किस्में अति उपयुक्त हैं। 

काली पत्ती :- यह किस्म 2011 में जारी की गयी थी। यह अधिक उपज वाली और अच्छी गुणवत्ता वाली किस्म है। इसके फल अंडाकार और कम बीज वाले होते हैं जैसे 1 – 4 बीज प्रति फल में होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 166 किलो प्रति वृक्ष होती है। फल मुख्यतः सर्दियों में पकते हैं।

क्रिकेट बाल :- यह किस्म भी 2011 में जारी की गयी थी। इसके फल बड़े, गोल आकार के होते है तथा गुदा दानेदार होता है। ये फल ज्यादा मीठे नहीं होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 157 किलो प्रति वृक्ष होती है।

बारामासी :- इस किस्म के फल मध्यम व गोलाकार होते हैं।

चीकू फसल में सिंचाई 

बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है लेकिन गर्मी में 7 दिन व ठंडी में 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करने से चीकू में अच्छी फलन एवं पौध वृद्धि होती है।

टपक सिंचाई करने से लगभग 40 प्रतिशत तक पानी बचता है। शुरूआती अवस्था में पहले दो वर्षों के दौरान, वृक्ष से 50 सेमी के फासलें पर 2 ड्रिपर लगाएं और उसके बाद 5 वर्षों तक वृक्ष से 1 मीटर के फासले पर 4 ड्रिपर लगाएं।

खाद एवं उर्वरक 

पेड़ों में प्रति वर्ष आवश्यकतानुसार खाद डालते रहना चाहिए जिससे उनकी वृद्धि अच्छी हो और उनमें फलन अच्छी रहे। रोपाई के एक वर्ष बाद से प्रति पेंड 2 – 3 टोकरी गोबर की खाद, 2 – 3 किलो अरण्डी / करंज की खली एवं N P K की आवश्यक मात्रा प्रति पौधा प्रति वर्ष डालते रहना चाहिए। यह मात्रा 10 वर्ष तक बढ़ाते रहना चाहिए।  

चीकू में अंतरफसली

सिंचाई की उपलब्धता और जलवायु के आधार पर अनानास और कोकोआ, टमाटर, बैंगन, फूलगोभी, मटर, कद्दू, केला और पपीता को अंतरफसली के तौर पर उगाया जा सकता है।

चीकू फसल का रख – रखाव

चीकू के पौधे को शुरुआत में दो – तीन साल तक विशेष रक् – रखाव की जरुरत होती है। इसके बाद वर्षों तक इसकी फसल मिलती रहती है। जाड़े एवं ग्रीष्म ऋतू में उचित सिंचाई एवं पाले से बचाव के लिए प्रबंधन करना चाहिए।

छोटे पौधे को पाले से बचाने के लिए पुआल या घास के छप्पर से इस प्रकार ढक दिया जाता है कि वे तीन तरफ ढके रहते हैं और दक्षिण – पूर्व दिशा धुप एवं प्रकाश के लिए खुला रहता है। चीकू का सदाबहार पेंड बहुत सुंदर दिखाई पड़ता है।

इसका तना चिकना होता है और उसमें चारों ओर लगभग सामान अंतर से शाखाएँ निकलती हैं जो भूमि के सामानांतर फैल जाती हैं। प्रत्येक शाखा में उनके छोटे – छोटे प्ररोह होते हैं, जिन पर फल लगते हैं। ये फल उत्तपन्न करने वाले प्ररोह प्राकृतिक रूप से ही उचित अंतर पर पैदा होते हैं और उनके रूप एवं आकार में इतनी सुडौलता होती है कि उनको काट – छाँट की आवश्यकता नहीं होती।

चीकू के पेंड की काट – छाँट

पौधे की रोपाई करते समय मूलवृन्त पर निकली हुई टहनियों को काटकर साफ कर देना चाहिए। पेंड का क्षत्रक भूमि से 1 मी. ऊंचाई पर बनने देना चाहिए। जब पेंड बड़ा होता जाता है, तब उसकी निचली शाखाएँ झुकती चली जाती हैं और अंत में भूमि को छूने लगती हैं तथा पेंड की ऊपर की शाखाओं से ढक जाती है।

इन शखाओं में फल लगने भी बंद हो जाते हैं। इस अवस्था में इन शाखाओं को छाँटकर निकाल देना चाहिए।

फूल कब तक आते हैं 

वानस्पतिक विधि द्वारा तैयार चीकू के पौधों में दो वर्षों बाद फूल तथा फल आना आरम्भ हो जाता है इसमें फल साल में दो बार आता है, पहला फरवरी से जून तक और दूसरा सितम्बर से अक्टूबर तक।

फूल लगने से लेकर फल पककर तैयार होने में लगभग चार महीने लग जाते हैं। चीकू में भी फल गिरने की एक गंभीर समस्या है। फल गिरने से रोकने के लिए पुष्पन के समय फूलों पर जिब्रेलिक अम्ल के 50 से 100 PPM अथवा फल लगने के तुरंत बाद प्लैनोफिक्स 4 मिली/ली. पानी के घोल का छिड़काव करने से फलन में वृद्धि एवं फल गिरने में कमी आ जाती है।

चीकू के कीटों की रोकथाम 

चीकू के पौधों पर रोग एवं कीटों का आक्रमण कम होता है। लेकिन कभी – कभी उपेछित बागों में पर्ण दाग रोग तथा काली बेधक, पत्ती लपेटक एवं मिलीबग आदि कीटों का प्रभाव देखा जाता है।

पत्ते का जाला

इससे पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जिससे पत्ते सूख जाते हैं और वृक्ष की टहनियाँ भी सूख जाती हैं।

उपचार :- नयी टहनियाँ बनने के समय या फलों की तुड़ाई के समय कार्बरील 600 ग्राम या क्लोरपाइरीफास 200 मिली या कविन्लफास 300 मिली को 150 लीटर पानी में मिलाकर 20 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।

कली की सुंडी 

इसकी सुंडिया वनस्पति कलियों को खाकर उन्हें नष्ट करती हैं।

उपचार :- कुविन्लफास 300 मिली या फेम 20 मिली को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

बालों वाली सुंडी 

ये कीट नयी टहनियों और पौधों को अपना भोजन बनाकर नष्ट कर देते हैं।

उपचार :- कुविन्लफास 300 मिली को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

चीकू के रोग

पत्तों पर धब्बा रोग

गहरे जामुनी भूरे रंग के धब्बे जो कि मध्य में से सफेद रंग के होते हैं देखे जा सकते हैं। फल के तने और पंखुड़ियों पर लम्बे धब्बे देखे जा सकते हैं।

उपचार :- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम को प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

तने का गलना

यह एक फंगस वाली बीमारी है जिसके कारण तने और शाखाओं के मध्य में से लकड़ी गल जाती हैं।

उपचार :- कार्बेन्डाजिम 400 ग्राम या डायथेन जेड – 78 को 400 ग्राम को 150 ली. पानी में डालकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

एन्थ्रक्नोस 

तने और शाखाओं पर कैंकर के गहरे धंसे हुए धब्बे देखे जा सकते हैं और पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं।

 उपचार :- कॉपर आक्सीक्लोराइड या M – 45, 400 ग्राम को 150 ली. पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

चीकू फलों की तुड़ाई 

चीकू के फलों की तुड़ाई जुलाई – सितम्बर महीने में की जाती है। किसानों को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि अनपके फलों की तुड़ाई न करें। तुड़ाई मुख्यतः फलों के हल्के संतरी या आलू रंग के होने पर जब फलों में कम चिपचिपा दूधिया रंग हो तब की जाती है।  फलों को वृक्ष से तोडना आसान होता है।

चीकू में रोपाई के दो वर्ष बाद फल मिलना प्रारम्भ हो जाता है। जैसे – जैसे पौधा पुराना होता जाता है। उपज में वृद्धि होती जाती है। मुख्य्तः 5 – 10 वर्षों का वृक्ष 250 – 1000 फल देता है। एक 30 वर्ष के पेंड से 2500 से 3000 तक फल प्रति वर्ष प्राप्त हो जाते हैं।

चीकू फल का भण्डारण

तुड़ाई के बाद, छंटाई की जाती है और 7 – 8 दिनों के लिए 20 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जाता है। भण्डारण के बाद लकड़ी के डिब्बों में पैकिंग की जाती है और लम्बी दूरी वाले स्थानों पर भेजा जाता है।  

चीकू की खेती करने के लिए सभी प्रकार की निःशुल्क सहायता, सुझाव और पौधे खरीदने के लिए हमसे संपर्क करें। 

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जानें Taiwan Pink Guava की खेती, खासियत और फायदे के बारे में।

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हमारे देश भारत में युवा पीढ़ी अधिकतर डॉक्टर या इंजीनियर बनते हैं और वर्तमान में अब युवाओं की रूचि खेती बाड़ी की तरफ भी जाने लगा है। इसीलिए बहुत से युवा अब किसान बन रहें हैं। बता दें इस काम को करके वह लाखों रुपये तक की कमाई भी कर रहे हैं। ऐसे ही सफल किसानों की बहुत लम्बी सूचि है। जिन्होंने ताइवान पिंक अमरुद की जैविक और आधुनिक खेती करके समाज में एक ऐसी मिसाल कायम की है जो अन्य लोगों के लिए भी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि उन्होंने किस तरह ताइवान पिंक अमरुद की खेती की।

कैसे तैयार होते हैं पौधे 

ताइवान अमरुद के पौधे जितेंद्र बैंगलोर में स्थित टिश्यू कल्चर से तैयार करवाये जाते है। जहाँ पर इन्हे बनवाने के लिए कम से कम 6 माह पहले ही उस डिपार्टमेंट को बताना होता है ताकि समय पर पौधे मिल सकें। यहाँ तकरीबन हर साल 40 हजार पौधे तैयार करवाये जाते हैं। इस सब में तकरीबन एक से डेढ़ लाख तक खर्चा आता है। 

फल 6 महीनों में आने लगते हैं। 

यहां आपको जानकारी के लिए बता दें कि अगर 1 एकड़ जमीन में ताइवानी अमरुद के पौधे लगाए जायेंगे तो उसमें लगभग 800 पौधे लग जाते हैं। यह पौधे तकरीबन 6 महीने से लेकर एक साल के अंदर ही फल देना शुरू कर देते हैं। बता दें कि पहले वर्ष में ही हर पौधा 8 से 10 किलो तक फल देता है और इस प्रकार पहले ही साल में ही एक एकड़ जमीन पर 8 से 10 टन फलों का उत्पादन हो जाता है। इसी प्रकार दूसरे साल में प्रत्येक पौधे 20 से 25 किलो तक फल देते हैं जिसके कारण उत्पादन 25 टन पहुँच जाता है। 

खेती की तैयार और समय 

इस ताइवान अमरुद की खेती करने के लिए सर्वप्रथम खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई करनी चाहिए। उसके बाद खेत में पकी हुई गोबर की खाद डालने के आलावा उसमें बायो प्रोडक्ट्स भी डालें। फिर अपने ट्रैक्टर से एक पाल बनाये और इस बात का विशेषकर ध्यान रखें कि हर कतार से 9 फ़ीट तक की दूरी होना अनिवार्य है। इसी प्रकार से एक पौधे की दूरी दूसरे पौधे से 5 फीट तक होना आवश्यक है। इसके आलावा पौधे को बोने की गहराई आधा फ़ीट तक होनी चाहिए। साथ ही यह भी जान लीजिये की अगर आप ताइवान अमरुद के पौधे अपने खेतों में लगाना चाहते हैं, तो उसके लिए सबसे उचित समय जुलाई और अगस्त  का महीना है जिस समय बरसात का मौसम होता है। 

सिंचाई 

बता दें कि इसकी सिंचाई गर्मी के दिनों में 5 से 7 दिन में लगभग डेढ़ – दो घंटे तक करनी चाहिए। लेकिन आम दिनों में इसकी रेगुलर सिंचाई की जाती है। 

कब तक आते हैं फल 

यहां जानकारी के लिए बता दें कि ताइवान अमरुद की खेती में कम से कम 3 बार फल लगते हैं, परन्तु वह इसकी फसल को केवल नवम्बर के महीने में ही लेते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उनकी फसल में जुलाई तक फल आ जाते हैं जो कि नवम्बर तक पाक जाते हैं और वह आगे फरवरी या मार्च तक चलता है। 

कीटों से बचाव 

अपने फलों को कीटों से बचाने और मक्खी नियंत्रण करने के लिए जितेंद्र फोरमैन ट्रैप और स्टिकी ट्रैप का इस्तेमाल करते हैं। फोरमैन ट्रैप से एक प्रकार की गंध निकलती है जो मक्खियों को आकर्षित करती है, और स्टिकी ट्रैप में एक चिपचिपा सा पदार्थ लगा हुआ होता है जिससे अगर कीट उनसे चिपकते हैं तो वह फिर मर जाता है। 

ताइवान अमरुद की खासियत 

1. यह फल अगर आप तोड़ कर रख लेंगे तो 8 दिनों तक भी खराब नहीं होता है। 

2. ताइवान अमरुद की खेती से 6 महीने से 12 महीने पश्चात ही फल मिलने लग जाते हैं। 

3. यह खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है और इसका रंग अंदर से हल्का गुलाबी होता है। 

4. साथ ही बता दें की इसका वजन 300 ग्राम से लेकर 800 ग्राम तक हो जाता है। 

5. बरसात के मौसम में दूसरे अन्य फल पकने लगते हैं लेकिन बारिश होने पर भी यह फल पकता नहीं है। 

आमदनी कितनी होती है। 

मौजूदा समय में ताइवानी अमरुद की मांग दिल्ली के आलावा उत्तर प्रदेश और अन्य दूसरे राज्यों में भी काफी अधिक बढ़ गयी है। सीजन में यह 40 रुपये किलो के भाव से बिकता है। लेकिन जब इसका सीजन चला जाता है तो फिर यह 25 रुपये किलो से 30 रुपये किलो के भाव से बिकता है।

Taiwan Pink Guava की खेती करने के लिए सभी प्रकार की निःशुल्क सहायता, सुझाव और पौधे खरीदने के लिए हमसे संपर्क करें। 

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जाने क्यों लगाया जाता है घरों में गिलोय का पौधा, होता है शुभ।

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कोरोना काल में रोग प्रति-रोधक क्षमता बढ़ाने के लिए औषधीय पौधे का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ‘एनबीटी जड़ी-बूटी ‘ अभियान में ऐसे औषधीय पौधों की पूरी जानकारी मिलेगी, ताकि आप इनका आसानी से इस्तेमाल कर सकें और अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकें। इसके तहत आज गिलोय से जुड़ी हर जानकारी आपको मिलने वाली है। 

गिलोय, एक औषधीय पौधा है जो इन दिनों कोरोना की वजह से ज्यादा चर्चा में है और लोग इसका इस्तेमाल भी अभी खूब कर रहे हैं। इम्यून सिस्टम को स्ट्रांग करने और लिवर से जुड़ी बीमारियों में काफी असरदार गिलोय के बारे में हर घर में बाते हो रही हैं। जब से कोरोना का संक्रमण फैला है और इससे बचाव के लिए काढ़ा भी लाभकारी बताया गया है, तब से गिलोय का सेवन हर कोई कर रहा है। न केवल आयुष मंत्रालय बल्कि पीएम मोदी जी ने भी काढ़ा पीने की अपील की है और गिलोय का काढ़ा में इस्तेमाल भी खूब हो रहा है। इसीलिए आज हम आपको इस मेडिसिनल प्लांट से जुड़ी हर जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। आप अपने किचन गार्डन और बालकनी के गमले में इसे लगा सकते हैं और रोजगार की इच्छा रखते हैं तो इसकी खेती भी कर सकते हैं। 

गिलोय क्या है। ( What is Giloy )

गिलोय का वानस्पतिक नाम टोनोस्पोरा कार्डियोफेलिया है, जिसे आयुर्वेद में गिलोय के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में इसे अमृता कहा जाता है, क्योंकि यह कभी नहीं मरता है। गिलोय भारतीय मूल की बहुवर्षीय बेल है। इसके बीज काली मिर्च की तरह होते हैं। इसे मई और जून में बीज या कटिंग के रूप में बोया जा सकता है। मानसून के वक्त यह तेजी बढ़ता है। इसे बहुत धूप की जरुरत नहीं होती है। कई प्रदेशों में इसकी खेती होती है।

गिलोय का इस्तेमाल (use of Giloy )

कोविड- 19 से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए गिलोय का इस्तेमाल हो रहा है। लोग पाउडर, जूस और काढ़े के रूप में इसका इस्तेमाल कर रहें हैं। इसके पत्ते और तना दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। इसे घर के गमलों, किचन गार्डन, टेरेस गार्डन और बगीचे में आसानी से लगाया जा सकता है। इन सभी जगहों पर गिलोय की बेल आसानी से फैल सकती है। इसका तना ऊँचा चढ़ता है तथा हवा से नमी लेता है। फसल के तौर पर इसे तैयार होने में करीब 10 महीने लगते हैं। एक हेक्टेयर में इसकी खेती कर 60 से 70 हजार का मुनाफा हो सकता है। 

गुणों की खान है गिलोय 

  • गिलोय की खासियत के कारण इसके कई नाम हैं। मसलन, अमृता, गुडची, गुणबेल
  • यह एंटी बैक्टीरियल, एंटी एलर्जिक, एंटी डायबिटीज़ और दर्द निवारक होता है। 
  • इसके तने को जूस, पाउडर, टेबलेट,काढ़े या अमृतारिष्ट के रूप में लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। 
  • जिन लोगो की इम्युनिटी कम हो, उन्हें गिलोय का सेवन करने की सलाह दी जाती है। 
  • यह ऑटो इम्यून डिसार्डर, बुखार, हाथ पैर की जलन, शरीर दर्द, डायबिटीज, लाइफ स्टाइल डिसार्डर और पेशाब की जुड़ी समस्याएँ दूर करने में काम आती हैं। 
  • गिलोय का रोजाना इस्तेमाल बीमारियों से दूर रखता है। कोई बीमारी हो भी जाये तो इलाज के दौरान भी इसका सेवन ज्यादा प्रभावकारी होता है। 

फाइबर और प्रोटीन भी

गिलोय में 15.8 % फाइबर होता है। इसके साथ 4.2 से 11.2 % तक प्रोटीन, 60 फीसदी कार्बोहाइड्रेड और 3 फीसदी से कम फैट मिलता है। इसके आलावा पोटैशियम, आयरन और कैल्शियम भी होते हैं।

कैसे करें इस्तेमाल 

  • आयुर्वेद के मुताबिक, गिलोय के तने का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए 5 से 6 इंच लम्बा और अंगूठे के बराबर मोटा तना लें। पानी मिलाकर इसे कूटें और रस निकल लें। इस रस को रोजाना 10 से 20 मिली इस्तेमाल किया जा सकता है। 
  • काढ़े के इस्तेमाल के लिए तने को चार गुने पानी लेकर उबाल लें। काढ़ा आधा या चौथाई रह जाये तो उसे छान कर पी लें। 
  • पाउडर के तौर पर इस्तेमाल के लिए गिलोय के तने छाँव में सूखा लें। फिर कूट लें। इसके बाद मिक्सर में पाउडर बना लें और कपड़े से छान लें। 
  • बाजार में गिलोय की गोलियाँ भी मिलती हैं। वैद्य या चिकित्सक की सलाह पर इनका सेवन कर सकते हैं। 
  • बाजार में अमृतारिष्ट भी आता है। इसे भोजन के बाद आधा कप पानी के साथ ले सकते हैं। इसके अलावा अमृतादि गुग्गुल का भी फार्मुलेशन मिलता है। 

लागत 15 से 20 हजार

गिलोय को अमूमन फलों के बाग में उगाया जाता है। खेतों में उगाने पर लागत थोड़ी बढ़ जाती है। सहफसली के तौर पर एक हेक्टेयर में 15 से 20 हजार और खेत में 30 से 40 हजार की लागत लगती है। एक हेक्टेयर खेत में करीब 2500 कटिंग की जरुरत पड़ती है। इसकी कटिंग 3 मीटर की दूरी पर लगनी चाहिए और गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए। मई जून में कटिंग लगाने के बाद फरवरी मार्च में इसके तने इस्तेमाल के लायक हो जाते हैं। एक हेक्टेयर में 10 से 8 कुन्टल तना मिलता है। इसकी कीमत 23 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम होती है। दिल्ली की नर्सरी में आमतौर पर गिलोय उगाया जाता है। दिल्ली सरकार की नर्सरी में गिलोय निःशुल्क लिया जा सकता है जबकि आमतौर पर गिलोय की बेल गमले में लगाने के लिए लगभग 30 से 50 रुपये में मिल जाती है। कोरोना काल में खुदरा मार्केट में यह कहीं-कहीं 100 रुपये तक भी बिक रहा है। इसकी मांग लगभग दो गुनी हो चुकी है।

बीज बोएं तो 2 से 3 इंच का फासला रखें

गिलोय के बीज एक घंटा पानी में भिगो दें। थाली जैसे किसी बर्तन में, मिटटी, खाद और मौरंग के मिश्रण की 2 से 3 इंच मोटी परत लगायें। बीज बोयें और 2 से 3 इंच का फासला रखें।  फिर हल्के पानी का छिड़काव कर दें। पौधा निकल आये तो दूसरे गमले में लगा दें।

कटिंग वही रोपें, जहाँ गांठ हो 

कटिंग रोपने के लिए पेंसिल के बराबर मोठे तने का इस्तेमाल करें, जिसमें गांठें हो। एक तने की लम्बाई एक बालिश तक लें। ऊपर से तिरछा और नीचे से गोल रखें। कटिंग को गोल वाले हिस्से को जमीन, गमले या थैले में दबा दें। गांठ से नए कल्ले निकल आएंगे। 

गिलोय सत्व से भी अच्छी कमाई 

बाजार में गिलोय सत्व की भी खूब डिमांड है। ऐसे में यह भी कमाई का अच्छा जरिया बन सकता है। सत्व निकालने के 20 किलो गिलोय का तना इकट्ठा करें। इसके छोटे-छोटे टुकड़े करें। एक बार पानी में साफ कर दुबारा इसका पानी निकाल लें। छाने गए पानी को रात भर छोड़ दें। नीचे स्टार्च जमा हो जायेगा। अगले दिन ऊपर का पानी हटा दें। फिर नीचे जमा सत्व को सूखा लें। लगभग 5 किलो गिलोय में 100 ग्राम सत्व निकलता है। बाजार में इसकी कीमत करीब 8000 रुपये किलो तक है।   

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जानें Soil Booster का उपयोग और फायदे।

Buy Soil Booster

Soil Booster क्या है। (What is Soil Booster)

Soil Booster एक आर्गेनिक फ़र्टिलाइज़र होता है। यह पूरी तरह केमिकल फ्री (Chemical Free ) होता है। Soil Booster को सभी प्रकार की मिटटी में use किया जा सकता है। 

Soil Booster को 

नीम खली 

सरसों खली 

बोनेमिक्स 

कोको पिट 

वर्मी कम्पोस्ट 

Chicken Manure 

आदि गुणकारी चीजों से मिलाकर बनाया जाता है। 

प्रयोग/use 

बड़े गमले में 100 ग्राम व छोटे गमले में 50 ग्राम प्रति पौधे व जमीन में पौधों की उम्र के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए। Soil Booster को मिटटी में मिलाकर तुरन्त पानी देना चाहिए ताकि Soil Booster मिटटी में अच्छी तरह मिल जाये।

फायदे/Benefits 

1. Soil Booster मिटटी की उर्वरा शक्ति को बढ़ा देता है। 

2. Soil Booster मिटटी की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ा देता है। 

3. Soil Booster मिलाने से पौधों की ग्रोथ अच्छी तरह होती है। 

4. Soil Booster को मिटटी में मिलाने से मिटटी के रोग खत्म हो जाते हैं। 

5. Soil Booster पौधों में लगने वाले रोगों से पौधे की रक्षा करता है।