मानसून आने के पहले 1.5 अथवा 2 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए। इसके लिए गड्डे खोदने के बाद 15 दिनों तक गड्डों को खुली धूप में छोड़ने के बाद आवश्यकतानुसार गोबर की सड़ी खाद + एक किलो नीम की खली एवं बोनोमिल मिटटी में मिलाकर 15 सेमी ऊँचाई तक भराव कर देना चाहिए। हल्की सिंचाई के बाद जब खाद व मिटटी बैठ जाये तथा हल्की नमी होने पर पौधा रोपना चाहिए।
पौधा रोपड़ की दूरी
5″ x 6″ के पॉली बैग में मिटटी खाद व रेत बराबर मात्रा में एवं प्रति थैली 2 ग्राम फ्यूराडान पाउडर डालें तत्पश्चात 2 बीज एक थैली में 1/2 सेमी0 की गहराई में डालें तथा नियमित रूप से पानी दें। तथा थैलियों व पौधों को धूप में रखें। नए पौधे उगने के बाद उन पर कैंटान 0.2 % घोल से छिड़काव करें तथा जब पौधे लगभग 6′ के हो जाये तब खेत में लगाएं।
पौधों की मात्रा :- लगभग 2500 पौधे प्रति हेक्टेयर लगाये तथा 10 % पौधे गैप फिलिंग के लिए सुरक्षित रखें।
गड्डों का आकार:- 0.3 x 0.3 x 0.3 मीटर के गड्डे बनायें।
गड्डों का भराव :- गड्डों को 1 / 2 मिटटी 1 / 4 गोबर की खाद एवं 1 / 4 रेत मिलाकर प्रति गड्डा 10 ग्राम फ्यूराडान डालें।
पौधे लगाने की विधि
पौधे की जड़ों को गड्डे की मिटटी में स्थापित कर दें। पौधे को अधिक गहराई में न लगायें अन्यथा जड़ सड़ने का खतरा रहता है। यदि अधिक हवा चल रही हो तो पौधों को लकड़ी का सहारा दें। सिंचाई आवश्यकतानुसार करें।
कीड़ों और बीमारियों से रोकथाम
वेटसल्फ 4 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें यदि मिटटी में कीड़ें हो तो फ्यूराडान मिटटी में डालें। अगर पत्तों में सड़न अथवा काले धब्बे हो तो डायथेन M – 45.02 % का छिड़काव करें। रस चूसने वाले कीड़े को नियंत्रित करने के लिए रोगोर अथवा साईपर मेथ्रिन का छिड़काव करें।
उपज
पौध रोपड़ के 3 – 4 माह बाद फूल लगकर फल लगना प्रारम्भ हो जाते हैं तथा 8 – 9 माह में फल पकना प्रारम्भ हो जाता है। 24 माह तक पौधों में अच्छे फल प्राप्त होंगे। पूरे जीवन में 85 से 125 फल प्राप्त होंगे। जिनका औसत वजन 1 से 1.5 किग्रा का होगा। इस प्रकार प्रति पौधा उपज 125 से 85 किग्रा प्राप्त हो सकती है। यदि कृषि कार्य पद्धति पूर्ण रूप से अपनाई जाये। मौसम एवं खेती करने के लिए अनुकूल वातावरण रहें।
ध्यान देने योग्य सुझाव
निचली एवं दलदली जमीन पर इसकी खेती न करे।
पौधों को अधिक गहराई में न रोपें।
तेज हवाओं से पौधों को बचायें।
अधिक पानी न दें।
फल जब 40% से 50% पीले रंग के दिखे तभी तोड़ें अन्यथा हरे फलों में मीठापन कम होता है।
पौधे ढलान वाली भूमि में लगायें यदि ढलान वाली भूमि न हो तो अधिक वर्षा का समय समाप्त होने पर पौधे लगायें।
बीज बोने से पहले 30 मिनट बीजों को गुनगुने पानी में भिगोकर रखें तत्पश्चात सूखे कपड़े में बीजों को बांधकर लटका दें। 7 – 8 घंटे बाद पानी हट जाने पर बोये। इससे अंकुरण अधिक व शीघ्र होगा।
विशेष :- उपरोक्त जानकारी हमारे कानपुर स्थित फार्म पर किये गये परिक्षण के आधार पर है विभिन्न जलवायु, मौसम, तापक्रम एवं वातावरण खेती करने के तरीके, खाद, पानी से विभिन्न अंतर आ सकते हैं उपरोक्त जानकारी से सफल खेती करने में मदद मिल सकती है।
दुनिया में बागबानी से अच्छा शौक शायद ही कोई और होगा। इसमें आप अपनी मेहनत से कई फल और सब्जियाँ ऊगा सकते है। ये एक विज्ञान है और इसमें बीज से पौधा बनाने के लिए बहुत प्लानिंग की जरुरत होती है,साथ ही ये एक कला का काम भी है। खूबसूरत बगीचे का ख्याल रखने के लिए ढेर सारी कला की जरुरत होती है।
इस काम में बहुत मेहनत और समय की भी जरुरत होती है क्योंकि बीज से फल निकालने के लिए बहुत अनुभव और समय चाहिए होता है। हम सभी में इतना धैर्य नहीं होता है। ऐसे में जो लोग पहली बार बागबानी करते हैं वो धैर्य की कमी से इसे छोड़ देते हैं। ऐसी किसी परिस्थित से बचने क्र लिए बेहतर होगा कि आप अपनी बागबानी की शुरुआत ऐसी सब्जियों से करें जो कम समय में ही तेजी से उग जाती हों। इसमें आपको अपनी मेहनत का तुरंत असर दिखेगा और आपको प्रोत्साहन भी मिलेगा। तो चलिए जानते हैं उन सब्जियों के बारे में जो एक महीने के अंदर ही उग जाती हैं।
कई पोषक तत्वों से भरपूर मूली कई भारतीय आहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मूली उगाने की सबसे खास बात ये है कि इसे किसी भी मौसमी परिस्थिति की जरुरत नहीं होती है और ये किसी भी मौसम में उग सकती है। मूली उगाने के लिए जमीन में मूली के बीज गाड़ दें और 1 से 2 दिन में पानी डालें। आमतौर पर मूली को उगने में 25 दिन लगते हैं। कुछ मामलों में इसे 30 दिन भी लग जाते हैं।
इस सब्जी को आप कच्चा भी खा सकते हैं और कई रेसिपीज में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। साल में किसी भी मौसम में उगने वाली ये सब्जी ज्यादा समय भी नहीं लेती है लेकिन इसे जगह की ज्यादा जरुरत होती है। इसीलिए इसे अपने किचन में अलग से जगह बनाकर उगायें। इसके लिए आप ट्रेलिसेस का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें 3 से 4 हफ़्तों में खीरे आने लगते हैं।
पालक हमारे आहार की सबसे स्वास्थवर्धक सब्जी है पालक जोकि 4 से 5 हफ्तों में उग जाती है इसके लिए आपको बढ़िया क़्वालिटी की खाद में बीज बोने होंगे। रोज पौधों को पानी डालें। अगर आप रोज इस पौधे को पानी डालतें हैं तो कुछ ही हफ़्तों में पालक के हरे पत्ते निकल आएंगे।
ये बेबी पालक, पालक का ही छोटा भाई है। इसकी पत्तियाँ पालक के मुकाबले थोड़ी छोटी होती हैं। इसको घर के बगीचे में लगाने के बाद यह आपके बगीचे की शोभा बढ़ाने के साथ – साथ आपकी सेहत का भी ख्याल रखेगा। यह भी पालक की तरह ही 4 से 5 हफ़्तों में निकल आता है।
लाल पालक, यह भी पालक के परिवार से ही सम्बंधित है। तो क्या हुआ यह लाल है तो, आखिर है तो पालक ही न। लाल पालक कई विटामिन्स और मिनिरल्स का स्रोत है। इसमें विटामिन A, विटामिन C, विटामिन K के साथ ही फोलेट, रिबोफ्लेविन और कैल्शियम भी मौजूद होता है। इसके आलावा यह पाचन शक्ति बढ़ाने में भी मददगार है।
क्या आपको पता है पौधों को सबसे ज्यादा खतरा किस मौसम में होता है। पौधों को सबसे ज्यादा खतरा सर्दियों के मौसम में होता है और खासकर तो गुलाब के पौधों पर गहरा असर पड़ता है क्योंकि सर्दी के मौसम में ठंडी हवा चलती है, ऐसे में बगीचे के संवेदनशील पौधों के खराब होने का डर रहता है। बगीचे के सबसे सुन्दर पौधे गुलाब के पौधों को सर्दी के दिनों में सबसे ज्यादा देखभाल की जरुरत पड़ती है। गुलाब की पत्तियाँ बहुत ही नाजुक होती है, तापमान के कम या ज्यादा होने पर सबसे ज्यादा फर्क इन्हीं पर पड़ता है। तो जाहिर सी बात है कि सर्दी के मौसम में गुलाब के पौधे की अधिक देखभाल की जाये।
अतः इसी चीज को ध्यान में रखते हुए आज यहाँ आपको कुछ टिप्स दिये जा रहें हैं की सर्दी के दिनों में गुलाब के पौधों की देखभाल कैसे करें।
1. पौधे को ढक दें :- सर्दियों के दिनों में रात के समय ठंडी हवाएं चलने पर गुलाब के पौधे को किसी बड़ी पॉलीथीन से ढक दें। आप चाहें तो कार्डबोर्ड बॉक्स या प्लास्टिक बॉक्स का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस तरह से गुलाब का पौधा सुरक्षित रहेगा।
2. गन्दगी साफ कर दें :- गुलाब के पौधे सबसे ज्यादा संवेदनशील होते है। उन्हें सबसे ज्यादा केयर की जरुरत होती है। अगर आपके घर में गुलाब के पौधों के पास गन्दगी या सूखी पत्तियाँ हों, तो उसे तुरंत साफ कर दें। इस पौधे को संक्रमण या कण्डव रोग सबसे ज्यादा लगता है, इसलिए पौधे के आस – पास स्वच्छता बनाये रखें।
3. पानी दें :- सर्दियों के दिनों में गुलाब के पौधे बहुत जल्दी ड्राई और डिहाइड्रेट हो जाते है। ऐसे में आप हर दिन उन्हें पानी दें ताकि वह ताजे रहें और उनमें पानी की कमी न रहे, क्योंकि हम सभी को पता है की पौधा या कोई सजीव वस्तु उसे पानी की पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है। सही मात्रा में पानी देने से पौधे का विकास भी अच्छी तरह होता है।
4. जड़ों को ढक दें :- अगर आपके घर में गुलाब का पौधा काफी बड़ा हो चूका है और उसे अंदर रखना या पूरा ढकना मुश्किल है तो उसकी जड़ों को ढक लें। जड़ों को ढकने से पूरे पौधे और तने को सर्द हवाओं के संपर्क में आने से बचाया जा सकता है। किसी घास से भी गुलाब के पौधे की जड़ों को ढंका जा सकता है।
5. इनडोर गार्डनिंग करें :- अपने घर में गुलाब के पौधे को गमले में लगाएं ताकि आप उसे उठाकर घर में रख सकें। आप चाहें तो घर के अंदर भी इनडोर गार्डेनिंग कर सकते हैं। इस तरह से गुलाब को जलने या ख़राब होने से आसानी से बचाया जा सकता है। अगर पौधे को धूप की आवश्यकता है तो उसे धूप दिखा दें वरना छाँव में ही रखा रहने दें। गुलाब को कभी भी पाला या ओस में खुला न छोड़ें और ठंडी हवाओं से इसका बचाव करें।
केचुओं की मदद से कचरे को खाद में परिवर्तित करने हेतु केंचुओं को नियंत्रित वातावरण में पाला जाता है। इस क्रिया को वर्मी कल्चर कहते हैं, केंचुओं द्वारा कचरा खाकर जो कास्ट निकलती है उसे एकत्रित रूप से वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं।
वर्मी कम्पोस्ट में साधारण मृदा की तुलना में 5 गुना अधिक नाइट्रोजन, 7 गुना अधिक फास्फेट, 7 गुना अधिक पोटाश, 2 गुना अधिक मैग्नीशियम व कैल्शियम होते हैं। प्रयोगशाला जाँच करने पर विभिन्न पोषक तत्वों की मात्रा इस प्रकार पायी जाती है।
वर्मी कापमोस्ट के लाभ ( Benefits of Vermi Campost )
वर्मी कम्पोस्ट को भूमि में बिखेरने से भूमि भुरभुरी एवं उपजाऊ बनती है। इससे पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बनता हैं। जिससे पौधों का अच्छा विकास हो पाता है।
भूमि एक जैविक माध्यम है तथा इसमें अनेक जीवाणु होते हैं जो इसको जीवन्त बनाये रखते हैं। इन जीवाणुओं को भोजन के रूप में कार्बन की आवश्यकता होती है। वर्मी कम्पोस्ट मृदा से कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि करता है तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरंतरता प्रदान करता है।
वर्मी कम्पोस्ट में आवश्यक पोषक तत्व प्रचुर व संतुलित मात्रा में होते हैं। जिससे पौधे संतुलित मात्रा में विभिन्न आवश्यक तत्व प्राप्त कर सकते हैं।
वर्मी कम्पोस्ट के प्रयोग से मिटटी भुरभुरी हो जाती है जिससे उसमें पोषक तत्व व जल संरक्षण की क्षमता बढ़ जाती है व हवा का आवागमन भी मिट्टी में ठीक रहता है।
वर्मी कम्पोस्ट क्योंकि कूड़ा-करकट, गोबर व फसल अवशेषों से तैयार किया जाता है अतः गन्दगी में कमी करता है तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखता है।
वर्मी कम्पोस्ट टिकाऊ खेती के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है तथा यह जैविक खेती की दिशा में एक नया कदम है इस प्रकार की प्रणाली प्राकृतिक प्रणाली और आधुनिक प्रणाली जो की रासायनिक उर्वरकों पर आधारित है, के बीच समन्वय और सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है।
उपयोग विधि
वर्मी कम्पोस्ट जैविक खाद का उपयोग विभिन्न फसलों में अलग – अलग मात्रा में किया जाता है। खेती की तैयारी के समय 2.5 से 3.0 टन प्रति हेक्टेयर उपयोग करना चाहिए। खाद्यान फसलों में 5.0 से 6.0 टन प्रति हेक्टेयर मात्रा का उपयोग करें। फल वृक्षों में आवश्यकतानुसार 1.0 से 10 किग्रा / पौधा वर्मी कम्पोस्ट उपयोग करें तथा किचन, गार्डन और गमलों में 100 ग्राम प्रति गमला खाद का उपयोग करें तथा सब्जियों में 10 – 12 टन/हेक्टेयर वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करें।
वैसे तो जैविक खेती में बहुत सी खादों का प्रयोग किया जाता है लेकिन खाद के प्रयोग से भूमि की स्थिति में सुधार हो जाता है तथा भूमि में वायु का संचार अच्छे से होता है और जीवांश पदार्थों का निर्माण होता है। पौधों में वायुमंडल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण बढ़ जाता है और इनके फलस्वरूप उत्पाद में वृद्धि होती है।
जीवों के मृत शरीर, मल मूत्र, अवशेष, फार्म पर उगाई गयी फसलों और उद्योगों के उत्पादों आदि के विघटन से निर्मित पदार्थ को जैव पदार्थ कहते हैं। अतः जब इन्हीं पदार्थों को खाद में रूपांतरण करके जो उत्पाद बनता है उसे जैविक खाद कहते हैं। इसको जीवांश खाद या कार्बनिक खाद भी कहा जाता है। इससे भूमि की अवस्था में सुधार होता है और मृदा में वायु संचार बढ़ता है। इसके प्रयोग से विभिन्न रसायनों के दुष्प्रभाव से भूमि, पर्यावरण व कृषि उत्पाद को बचाया जा सकता है।
भूमि में उपस्थिति सूक्ष्म जीवाणु वायुमण्डल की नाइट्रोजन को पौधों की जड़ों में स्थिर करने का कार्य करते हैं। दलहनी पौधों की जड़ों पर कुछ विशेष प्रकार की ग्रंथिया पायी जाती हैं। जिनमें ये सूक्ष्म जीवाणु रहते हैं। सूक्ष्म जीवाणुओं की विभिन्न प्रजातियाँ उपलब्ध है, जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को अलग-अलग दर पर स्थिर करने का कार्य करती हैं। वायुमंडल में लगभग 74 % नाइट्रोजन होती है। इसको यह सूक्ष्म जीवाणु पौधों की जड़ों में एकत्रित करते रहते हैं। दलहनी फसलों में उड़द, मूंग, सोयाबीन, लोबिया आदि है। जिनको उगाने से भूमि की उत्पादकता व उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
पोषक तत्व आसानी से पौधों को उपलब्ध होने लगते है तथा भूमि के वातावरण में तेजी से सुधार होता है। इस प्रकार जैविक खाद का प्रयोग कार्बनिक खेती के उद्देश्य की पूर्ति करता है। जैविक खाद के क्षय व अपघटन के फलस्वरूप पौधों को पोषक तत्वों की आपूर्ति होती है।
गोबर की खाद में 0.5 – 1.5 % नाइट्रोजन, 0.4 – 0.8 % फॉस्फोरस व ( 0.5 – 1.9 % ) पोटाश पाया जाता है। गोबर की खाद पशुओं के मल-मूत्र व बिछावन और व्यर्थ चारे व दाने का मिश्रण होती है। गोबर की खाद का संगठन पशु की आयु और अवस्था, प्रयोग किये जाने वाले चारा व दाना, बिछावन की प्रकृति और उसका भंडार आदि कारकों पर निर्भर करती है। पशुओं की गोबर, मूत्र व बिछावन आदि को गड्डों में एकत्रित किया जाता है। गड्डों में एकत्रित गोबर खुले में होने के कारण लीचिंग ( leaching ) तथा वाष्पशीलता(Volatilization) के कारण पोषक तत्वों की हानि होती रहती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में तैयार की गयी कम्पोस्ट में 0.4 – 0. 8 % नाइट्रोजन, 0.3 – 0.6 % फॉस्फोरस तथा 0-7-1-0 % पोटाश पायी जाती है। विभिन्न फसलों के अवशेष, सूखे डंठल, गन्ने की सूखी पत्तियों व फसलों के अन्य अवशेषों को गड्डों में सड़ाकर बनायीं गयी खाद कम्पोस्ट खाद कहलाती है। इन अवशिष्ट पदार्थों को गड्डों में भर दिया जाता है। गड्डों को भरने के पश्चात् उसको मिटटी से ढक देते हैं। गच्चों में भरे अवशिष्ट पदार्थों के बीच-बीच में भी मिटटी की परतें डाली जाती है। ऐसा करने से गड्डों में सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा अपघटन की क्रिया तीव्रता से होती रहती है। कम्पोस्ट खाद बनाने में प्रयोग होने वाले पदार्थों को ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों से प्राप्त व्यर्थ के कूड़े-करकट को एकत्रित किया जाता है और गड्डों में भरते रहते हैं।
कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए विभिन्न विधियाँ प्रयोग में लायी जाती है।
वर्मी कम्पोस्ट में कुल नाइट्रोजन 0.5 – 1.5 % उपलब्ध फॉस्फोरस 0.1 – 0.3 % व उपलब्ध सोडियम 0.6 – 0.3 % पाया जाता है। वर्मी कम्पोस्ट एक ऐसी जैविक खाद है, जो केचुओं के द्वारा बनाई जाती है। वर्मी कम्पोस्ट के मिश्रण में कास्टिग, केचुएँ, सूक्ष्म-जीवाणु, मल आदि पाए जाते हैं। केचुओं के सहायता से बनाई गयी इस जैविक खाद को वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं।
इस प्रकार बनाई गयी खाद की प्रक्रिया वर्मी कम्पोस्टीकरण कहलाती है। इस क्रिया में केचुएँ मिट्टी को खाकर उसको मल के रूप में पाचन के उपरान्त बाहर निकालते रहते हैं। ऐसा अनुमान है कि 2000 केचुएँ एक वर्गमीटर जगह की मिट्टी को खाकर एक वर्ष में 100 मीट्रिक टन ह्यूमस का निर्माण करते हैं।
जैविक खेती में हरी खाद ( Green Manure in hindi ) का एक महत्वपूर्ण स्थान है। हरी खाद वाली फसलें भूमि में उगाकर कोमल अवस्था में बुआई के 30-35 दिन बाद गिराकर दवा दी जाती है। सड़ने और गलने के पश्चात इन फसलों से भूमि के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में सुधार होता है। भूमि में वायु संचार व पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
भूमि पर हरी खाद उगाने से भूमि कटाव पर भी नियंत्रण होता है। सनई व देचां प्रमुख हरी खाद वाली फसलें हैं। इनके अतिरिक्त ग्वार, मूंग, लोबिया आदि फसलें भी हरी खाद के रूप में प्रयोग की जाती हैं। हरी खाद उगाने से भूमि में नाइट्रोजन की भी वृद्धि होती है। नाइट्रोजन की मात्रा प्रयोग की गई फसल एवं पलटने की अवस्था पर निर्भर करती है। ऐसा अनुमान है कि हरी खाद की विभिन्न फसलों से 75 – 150 किलो नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि को प्राप्त होती है।
कृषि में जैविक खाद का महत्व ( Importance of Organic Manure in hindi )
भारत एक कृषि प्रधान देश है।
उन्नत कृषि करने के लिए आवश्यक है कि मृदा को पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में प्रदान किये जायें। फार्मयार्ड FYM तथा कम्पोस्ट आदि अच्छी जैविक खाद ( organic manure in hindi ) हैं। भारतीय किसान जैविक खादों का प्रयोग अधिक करने लगे हैं। क्योंकि मृदा में इनका प्रभाव कई वर्षों तक रहता है और ये कृत्रिम खादों की अपेक्षा सस्ते पड़ते हैं।
अगर आप कोई भी पौधा लगाते हो तो आपको दो चीजों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है बीजऔर खाद। आपको एक बात का ध्यान देने की जरूरत यह है कि पौधों को कौन-सी खाद कब और कैसे दें। सभी खाद सभी फसल या पौधों के लिए नहीं होती है। कभी – कभी गलत खाद का प्रयोग करने से फसल या पौधे की नुकसानी के साथ – साथ खर्च भी बढ़ जाता है।
NPK, NPK का फुलफॉर्म है नाइट्रोजन – फॉस्फोरस – पोटैशियम। NPK खाद अक्सर तीन तरह के अनुपात में मिलते हैं जो खाद के पैकेट पर लिखा रहता है। 18 : 18 : 18 , 19 : 19 : 19 और 12 : 32 : 16 के अनुपात में रहते हैं। ज्यादातर किसान 12 : 32 : 16 का ही प्रयोग करते हैं। इसमें 12 % नाइट्रोजन, 32 % फॉस्फोरस और 16 % पोटैशियम होता है। अभी कुछ समय से जिंक कोटेड रहने पर 0.5 % जिंक की मात्रा रहती है। इसमें 12 % नाइट्रोजन रहने के कारण पौधों के विकास के लिए उपयोग कर सकते हैं। लेकिन यह मात्रा बहुत कम है इसीलिए पौधों के विकास के लिए उपयोग करना खर्चीला होगा। फॉस्फोरस का प्रयोग किसान जड़ वाले पौधों के लिए कर सकते हैं। जैसे – गाजर, आलू, प्याज, मूली इत्त्यादि के लिए उपयोग कर सकते हैं। लेकिन NPK में फॉस्फोरस की मात्रा DAP से 14 % कम होती है।
उपयोग/Use
NPK में 16 % पोटैशियम रहने के कारण इस खाद को किसी भी पौधों के लिए उपयोग किया जा सकता है।
इस खाद का प्रयोग उसी समय करें जब पौधा फूल से लगने के समय में हो। जो की फूल से फल देता है।
जब पौधे की पत्तियाँ पीली पड़ने लगें तो समझ जाईये की पोटैशियम की कमी हो गयी है। तब आप NPK का उपयोग कर सकते हैं।
लेकिन इस बात का ध्यान देना जरुरी है की इसमें मात्र 16 % ही पोटैशियम रहता है। अगर इसके जगह किसी लिक्विड आधारित पोटैशियम का प्रयोग करते हैं जिसमें 16 % से ज्यादा मात्रा हो तो वह ज्यादा उपयोगी रहेगा।
2. यूरिया
यूरिया में केवल नाइट्रोजन होता है। नाइट्रोजन की कमी से पौधे का विकास कम होता है तथा पुरानी पत्तियाँ पीली पड़ने लगती है। यूरिया पौधों के विकास तथा पत्ती को हरा रखती है। जिससे पौधों को प्रकाश संश्लेषण में आसानी होती है। यह खाद सभी पौधों व फसल के लिए जरुरी है। जिससे की पौधों का विकास ज्यादा से ज्यादा हो सके। एक बात यह भी ध्यान देने की जरुरत है कि यूरिया के ज्यादा प्रयोग से पत्तियाँ मुरझा भी जाती हैं। इसके साथ ही इस खाद का प्रयोग SSP के साथ भी कर सकते हैं क्योंकि SSP में नाइट्रोजन 0 % रहता है इसके साथ यूरिया का प्रयोग करने से SSP खाद DAP से ज्यादा उपयोगी हो जाता है।
3. DAP
इस खाद की शुरुआत 1960 से हुई है और कम समय में ही पुरे देश के साथ – साथ विश्वप्रसिद्ध हो गयी है। इसका पूरा नाम Diammonium Phosphate है। यह एक रासायनिक खाद है तथा अमोनिया आधारित खाद है। DAP में 18 % नाइट्रोजन, 46 % फॉस्फोरस रहता है। इस 18 % नाइट्रोजन में से 15.5 % अमोनियम नाइट्रेट होता है तथा 46 % फॉस्फोरस में से 39.5 % फॉस्फोरस पानी में घुलनशील होता है।
फॉस्फोरस से पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं इसीलिए इस खाद का प्रयोग दो तरह के पौधों के लिए किया जाता है। जड़ आधारित पौधों तथा फूल आधारित पौधों के लिए। जैसे – आलू, गाजर, मूली, शकरकंद, प्याज इत्यादि। इसके आलावा फूल या फूल वाले पौधों के लिए फास्फोरस का उपयोग करते हैं। इस खाद से अनाज वाले फसल को ज्यादा कोई फायदा नहीं होता है। सिवाय की उस फसल की जड़ मजबूत और फैलती है। DAP खाद में 18 % नाइट्रोजन रहने के कारण किसान इसे पौधों के विकास के लिए उपयोग कर सकते हैं। लेकिन यह बहुत खर्चीला होगा तथा नाइट्रोजन की मात्रा भी कम मिलेगी।
फसलों का उत्पादन बढ़ाने में उर्वरकों का अत्यंत ही महत्वपूर्ण योगदान है, परन्तु उर्वरक के उपयोग का पूरा लाभ तभी मिलता है जब मिट्टी जाँच के आधार पर संतुलित उर्वरक के प्रयोग पर ध्यान दिया जाये। प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अनुशंसित मात्रा की आधी मात्रा डालने से फसलों का उत्पादन काफी कम हो जाता है।
अनुशंसित उर्वरकों की मात्रा से अधिक डालने पर उत्पादकता में वृद्धि नहीं होती है साथ ही साथ यह लाभकारी नहीं होता।
आम्लिक मिट्टियों के अम्लीयता के निराकरण के लिए चुने का व्यवहार आवश्यक है। चुने के प्रयोग के बाद ही संतुलित उर्वरक का व्यवहार लाभकारी होता है।
जैविक खाद या कम्पोस्ट के साथ-साथ संतुलित उर्वरकों के प्रयोग करने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहे एवं वर्षों तक अच्छी उपज प्राप्त की जा सके।
जिस प्रकार इंसानो को संतुलित आहार, पोषक तत्वों की जरुरत होती है उसी प्रकार पौधों को भी अपनी वृद्धि, प्रजनन और विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की जरुरत होती है। अगर पौधों को वो जरुरी पोषक तत्त्व न मिलें तो उनकी वृद्धि रुक जाती है। अगर वो जरुरी पोषक तत्व पौधों को निश्चित अवधि तक न मिलें तो पौधों की मृत्यु भी हो सकती है।
पौधे भूमि से जल और खनिज-लवण शोषित करके वायु से कार्बन डाई-ऑक्साइड प्राप्त करके सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं। पौधों को 17 तत्वों की आवश्यकता होती है, जिनके बिना पौधों की वृद्धि-विकास और प्रजनन आदि क्रियाएँ संभव नहीं हैं लेकिन इनमें से कुछ मुख्य तत्त्व इस प्रकार है।
कार्बन
हाइड्रोजन
ऑक्सीजन
नाइट्रोजन
फास्फोरस
पोटाश
इनमें से प्रथम 3 तत्त्व पौधे वायुमंडल से ग्रहण कर लेते हैं।
पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है –
नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है, जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है। यह पर्ण हरित के निर्माण में भी भाग लेती है। नाइटोजन का पौधों की विकास और वृद्धि में बहुत योगदान होता है।
यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है।
वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाता है।
यह दानों के बनने में मदद करता है।
सभी जीवित ऊतकों यानि जड़, तना, पत्ती की वृद्धि और विकास में सहायक है।
क्लोरोफिल, प्रोटोप्लाज्मा प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों का एक महत्वपूर्ण अवयव है।
पत्ती वाली सब्जियों की गुणवत्ता में सुधार करता है।
नाइट्रोजन – कमी के लक्षण
पौधों में प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना। निचली पत्तियाँ सड़ने लगती हैं, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं।
पौधे की बढ़वार का रुकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना।
फल वाले वृक्षों से फलों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना।
फॉस्फोरस
फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन शीघ्र होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स वफाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा मैट्रोकांड्रिया का मुख्य अवयव है।
फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा सुदृढ़ होती हैं। पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है।
फास्फोरस – कमी के लक्षण
पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्का बैगनी या भूरा हो जाता है। फॉस्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी(निचली) पत्तियों पर दिखते हैं।
दाल वाली फसलों में पत्तियाँ नीले हरे रंग की हो जाती हैं।
पौधों की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होता है। कभी – कभी जड़ें सूख भी जाती हैं।
अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना। फल व बीज का निर्माण सही न होना।
पोटेशियम
जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है।
स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है।
अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलों की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है। सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है। मिटटी में नाइट्रोजन के कुप्रभाव को कम करता है।
एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है।
ठण्डे और बादलयुक्त मौसम में पौधों द्वारा प्रकाश के उपयोग में वृद्धि करता है ,जिससे पौधों में ठंडक और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।
चीकू (Chiku) या सपोटा ( सपोटा ), सैपोटेसी कुल का पौधा है। भारत में चीकू अमेरिका के उष्ण कटिबंधीय भाग से लाया गया था। चीकू का पक्का हुआ फल स्वादिष्ट होता है। चीकू के फलों का छिलका मोटा व भूरे रंग का होता है। इसका फल छोटे आकार का होता है जिसमें 3 – 5 काले चमकदार बीज होते हैं।
चीकू की खेती फल उत्पादन तथा लेटेक्स उत्पादन के लिए की जाती है। चीकू के लेटेक्स का उपयोग चुइंगम तैयार करने के लिए किया जाता है। भारत में चीकू की खेती मुख्यतः फलों के लिए की जाती है। चीकू फल का प्रयोग खाने के साथ – साथ जैम व जैली आदि बनाने में किया जाता है।
चीकू में विटामिन A, ग्लूकोज, टैनिन, जैसे तत्व पाये जाते हैं जो कब्ज, एनीमिया, तनाव, बवासीर और जख्म को ठीक करने के लिए सहायक होते हैं। चीकू में कुछ खास तत्व पाए जाते हैं जो श्वसन तंत्र से कफ और बलगम निकाल कर पुरानी खाँसी में राहत देता है। चीकू में लेटेक्स अच्छी मात्रा में पाया जाता है इसीलिए यह दांत की कैविटी को भरने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
चीकू की व्यावसायिक खेती
भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों में इसकी बड़े क्षेत्रफल में खेती की जाती है। इस फल को उपजाने के लिए बहुत ज्यादा सिंचाई और अन्य रख – रखाव की जरुरत नहीं है। थोड़ी खाद और बहुत कम पानी से ही इसके पेंड फलने-फूलने लगते हैं।
भूमि व जलवायु
इसकी खेती के लिए गर्म व नम मौसम की आवश्यकता होती है। गर्मी में इसके लिए उचित पानी की व्यवस्था का होना भी आवश्यक है। इसे मिटटी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है लेकिन अच्छे निकास वाली गहरी जलोढ़, रेतीली दोमट और काली मिटटी चीकू की खेती के लिए उत्तम रहती है। चीकू की खेती के लिए मिटटी की PH मान 6 – 8 उपयुक्त होती है। चिकनी मिटटी और कैल्शियम की उच्च मात्रा युक्त मिटटी में इसकी खेती न करें।
चीकू का प्रवर्धन
चीकू की व्यावसायिक खेती के लिए शीर्ष कलम तथा भेंट कलम विधि द्वारा पौधा तैयार किया जाता है। पौधा तैयार करने का सबसे उपयुक्त समय मार्च – अप्रैल है। चीकू लगाने का सबसे उपयुक्त समय वर्षा ऋतु है।
पौधे की रोपाई
चीकू की खेती के लिए, अच्छी तरह से तैयार जमीन की आवश्यकता होती है। मिटटी को भुरभुरा करने के लिए 2 – 3 बार जोताई करके जमीन को समतल करें। रोपाई के लिए गर्मी के दिनों में ही 7 – 8 मीटर की दूरी पर वर्गाकार विधि से 90 x 90 सेमी आकार के गड्डे तैयार कर लेना चाहिए। गड्ढा भरते समय मिटटी के साथ लगभग 30 किलो गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद, 2 किलो करंज की खली एवं 5 – 7 किलो हड्डी का चुरा प्रत्येक गड्डे के दल में मिलाकर भर देना चाहिए। एक बरसात के बाद पौधे को गड्डे के बीचों – बीच लगा दें तथा रोपने के बाद चारों ओर की मिटटी अच्छी तरह दबा कर थावला बना दें।
चीकू के पौधे को शुरुआत में दो – तीन साल तक विशेष रख – रखाव की जरुरत होती है।
चीकू की किस्में
देश में चीकू की कई किस्में प्रचलित हैं। उत्तम किस्मों के फल बड़े, छिलके पतले, चिकने, गुदा मीठा और मुलायम होता है। क्रिकेट बॉल, काली पत्ती, भूरी पत्ती, P K M – 1, D S H – 2 झुमकिया आदि किस्में अति उपयुक्त हैं।
काली पत्ती:- यह किस्म 2011 में जारी की गयी थी। यह अधिक उपज वाली और अच्छी गुणवत्ता वाली किस्म है। इसके फल अंडाकार और कम बीज वाले होते हैं जैसे 1 – 4 बीज प्रति फल में होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 166 किलो प्रति वृक्ष होती है। फल मुख्यतः सर्दियों में पकते हैं।
क्रिकेट बाल :- यह किस्म भी 2011 में जारी की गयी थी। इसके फल बड़े, गोल आकार के होते है तथा गुदा दानेदार होता है। ये फल ज्यादा मीठे नहीं होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 157 किलो प्रति वृक्ष होती है।
बारामासी :- इस किस्म के फल मध्यम व गोलाकार होते हैं।
चीकू फसल में सिंचाई
बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है लेकिन गर्मी में 7 दिन व ठंडी में 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करने से चीकू में अच्छी फलन एवं पौध वृद्धि होती है।
टपक सिंचाई करने से लगभग 40 प्रतिशत तक पानी बचता है। शुरूआती अवस्था में पहले दो वर्षों के दौरान, वृक्ष से 50 सेमी के फासलें पर 2 ड्रिपर लगाएं और उसके बाद 5 वर्षों तक वृक्ष से 1 मीटर के फासले पर 4 ड्रिपर लगाएं।
खाद एवं उर्वरक
पेड़ों में प्रति वर्ष आवश्यकतानुसार खाद डालते रहना चाहिए जिससे उनकी वृद्धि अच्छी हो और उनमें फलन अच्छी रहे। रोपाई के एक वर्ष बाद से प्रति पेंड 2 – 3 टोकरी गोबर की खाद, 2 – 3 किलो अरण्डी / करंज की खली एवं N P K की आवश्यक मात्रा प्रति पौधा प्रति वर्ष डालते रहना चाहिए। यह मात्रा 10 वर्ष तक बढ़ाते रहना चाहिए।
चीकू में अंतरफसली
सिंचाई की उपलब्धता और जलवायु के आधार पर अनानास और कोकोआ, टमाटर, बैंगन, फूलगोभी, मटर, कद्दू, केला और पपीता को अंतरफसली के तौर पर उगाया जा सकता है।
चीकू फसल का रख – रखाव
चीकू के पौधे को शुरुआत में दो – तीन साल तक विशेष रक् – रखाव की जरुरत होती है। इसके बाद वर्षों तक इसकी फसल मिलती रहती है। जाड़े एवं ग्रीष्म ऋतू में उचित सिंचाई एवं पाले से बचाव के लिए प्रबंधन करना चाहिए।
छोटे पौधे को पाले से बचाने के लिए पुआल या घास के छप्पर से इस प्रकार ढक दिया जाता है कि वे तीन तरफ ढके रहते हैं और दक्षिण – पूर्व दिशा धुप एवं प्रकाश के लिए खुला रहता है। चीकू का सदाबहार पेंड बहुत सुंदर दिखाई पड़ता है।
इसका तना चिकना होता है और उसमें चारों ओर लगभग सामान अंतर से शाखाएँ निकलती हैं जो भूमि के सामानांतर फैल जाती हैं। प्रत्येक शाखा में उनके छोटे – छोटे प्ररोह होते हैं, जिन पर फल लगते हैं। ये फल उत्तपन्न करने वाले प्ररोह प्राकृतिक रूप से ही उचित अंतर पर पैदा होते हैं और उनके रूप एवं आकार में इतनी सुडौलता होती है कि उनको काट – छाँट की आवश्यकता नहीं होती।
पौधे की रोपाई करते समय मूलवृन्त पर निकली हुई टहनियों को काटकर साफ कर देना चाहिए। पेंड का क्षत्रक भूमि से 1 मी. ऊंचाई पर बनने देना चाहिए। जब पेंड बड़ा होता जाता है, तब उसकी निचली शाखाएँ झुकती चली जाती हैं और अंत में भूमि को छूने लगती हैं तथा पेंड की ऊपर की शाखाओं से ढक जाती है।
इन शखाओं में फल लगने भी बंद हो जाते हैं। इस अवस्था में इन शाखाओं को छाँटकर निकाल देना चाहिए।
फूल कब तक आते हैं
वानस्पतिक विधि द्वारा तैयार चीकू के पौधों में दो वर्षों बाद फूल तथा फल आना आरम्भ हो जाता है इसमें फल साल में दो बार आता है, पहला फरवरी से जून तक और दूसरा सितम्बर से अक्टूबर तक।
फूल लगने से लेकर फल पककर तैयार होने में लगभग चार महीने लग जाते हैं। चीकू में भी फल गिरने की एक गंभीर समस्या है। फल गिरने से रोकने के लिए पुष्पन के समय फूलों पर जिब्रेलिक अम्ल के 50 से 100 PPM अथवा फल लगने के तुरंत बाद प्लैनोफिक्स 4 मिली/ली. पानी के घोल का छिड़काव करने से फलन में वृद्धि एवं फल गिरने में कमी आ जाती है।
चीकू के कीटों की रोकथाम
चीकू के पौधों पर रोग एवं कीटों का आक्रमण कम होता है। लेकिन कभी – कभी उपेछित बागों में पर्ण दाग रोग तथा काली बेधक, पत्ती लपेटक एवं मिलीबग आदि कीटों का प्रभाव देखा जाता है।
पत्ते का जाला
इससे पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जिससे पत्ते सूख जाते हैं और वृक्ष की टहनियाँ भी सूख जाती हैं।
उपचार :- नयी टहनियाँ बनने के समय या फलों की तुड़ाई के समय कार्बरील 600 ग्राम या क्लोरपाइरीफास 200 मिली या कविन्लफास 300 मिली को 150 लीटर पानी में मिलाकर 20 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।
कली की सुंडी
इसकी सुंडिया वनस्पति कलियों को खाकर उन्हें नष्ट करती हैं।
उपचार :- कुविन्लफास 300 मिली या फेम 20 मिली को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
बालों वाली सुंडी
ये कीट नयी टहनियों और पौधों को अपना भोजन बनाकर नष्ट कर देते हैं।
उपचार :- कुविन्लफास 300 मिली को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
चीकू के रोग
पत्तों पर धब्बा रोग
गहरे जामुनी भूरे रंग के धब्बे जो कि मध्य में से सफेद रंग के होते हैं देखे जा सकते हैं। फल के तने और पंखुड़ियों पर लम्बे धब्बे देखे जा सकते हैं।
उपचार :- कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम को प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
तने का गलना
यह एक फंगस वाली बीमारी है जिसके कारण तने और शाखाओं के मध्य में से लकड़ी गल जाती हैं।
उपचार :- कार्बेन्डाजिम 400 ग्राम या डायथेन जेड – 78 को 400 ग्राम को 150 ली. पानी में डालकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
एन्थ्रक्नोस
तने और शाखाओं पर कैंकर के गहरे धंसे हुए धब्बे देखे जा सकते हैं और पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं।
उपचार :- कॉपर आक्सीक्लोराइड या M – 45, 400 ग्राम को 150 ली. पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
चीकू फलों की तुड़ाई
चीकू के फलों की तुड़ाई जुलाई – सितम्बर महीने में की जाती है। किसानों को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि अनपके फलों की तुड़ाई न करें। तुड़ाई मुख्यतः फलों के हल्के संतरी या आलू रंग के होने पर जब फलों में कम चिपचिपा दूधिया रंग हो तब की जाती है। फलों को वृक्ष से तोडना आसान होता है।
चीकू में रोपाई के दो वर्ष बाद फल मिलना प्रारम्भ हो जाता है। जैसे – जैसे पौधा पुराना होता जाता है। उपज में वृद्धि होती जाती है। मुख्य्तः 5 – 10 वर्षों का वृक्ष 250 – 1000 फल देता है। एक 30 वर्ष के पेंड से 2500 से 3000 तक फल प्रति वर्ष प्राप्त हो जाते हैं।
चीकू फल का भण्डारण
तुड़ाई के बाद, छंटाई की जाती है और 7 – 8 दिनों के लिए 20 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जाता है। भण्डारण के बाद लकड़ी के डिब्बों में पैकिंग की जाती है और लम्बी दूरी वाले स्थानों पर भेजा जाता है।
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हमारे देश भारत में युवा पीढ़ी अधिकतर डॉक्टर या इंजीनियर बनते हैं और वर्तमान में अब युवाओं की रूचि खेती बाड़ी की तरफ भी जाने लगा है। इसीलिए बहुत से युवा अब किसान बन रहें हैं। बता दें इस काम को करके वह लाखों रुपये तक की कमाई भी कर रहे हैं। ऐसे ही सफल किसानों की बहुत लम्बी सूचि है। जिन्होंने ताइवान पिंक अमरुद की जैविक और आधुनिक खेती करके समाज में एक ऐसी मिसाल कायम की है जो अन्य लोगों के लिए भी काफी उपयोगी साबित हो सकती है। आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि उन्होंने किस तरह ताइवान पिंक अमरुद की खेती की। .
ताइवान अमरुद के पौधे जितेंद्र बैंगलोर में स्थित टिश्यू कल्चर से तैयार करवाये जाते है। जहाँ पर इन्हे बनवाने के लिए कम से कम 6 माह पहले ही उस डिपार्टमेंट को बताना होता है ताकि समय पर पौधे मिल सकें। यहाँ तकरीबन हर साल 40 हजार पौधे तैयार करवाये जाते हैं। इस सब में तकरीबन एक से डेढ़ लाख तक खर्चा आता है।
फल 6 महीनों में आने लगते हैं।
यहां आपको जानकारी के लिए बता दें कि अगर 1 एकड़ जमीन में ताइवानी अमरुद के पौधे लगाए जायेंगे तो उसमें लगभग 800 पौधे लग जाते हैं। यह पौधे तकरीबन 6 महीने से लेकर एक साल के अंदर ही फल देना शुरू कर देते हैं। बता दें कि पहले वर्ष में ही हर पौधा 8 से 10 किलो तक फल देता है और इस प्रकार पहले ही साल में ही एक एकड़ जमीन पर 8 से 10 टन फलों का उत्पादन हो जाता है। इसी प्रकार दूसरे साल में प्रत्येक पौधे 20 से 25 किलो तक फल देते हैं जिसके कारण उत्पादन 25 टन पहुँच जाता है।
खेती की तैयार और समय
इस ताइवान अमरुद की खेती करने के लिए सर्वप्रथम खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई करनी चाहिए। उसके बाद खेत में पकी हुई गोबर की खाद डालने के आलावा उसमें बायो प्रोडक्ट्स भी डालें। फिर अपने ट्रैक्टर से एक पाल बनाये और इस बात का विशेषकर ध्यान रखें कि हर कतार से 9 फ़ीट तक की दूरी होना अनिवार्य है। इसी प्रकार से एक पौधे की दूरी दूसरे पौधे से 5 फीट तक होना आवश्यक है। इसके आलावा पौधे को बोने की गहराई आधा फ़ीट तक होनी चाहिए। साथ ही यह भी जान लीजिये की अगर आप ताइवान अमरुद के पौधे अपने खेतों में लगाना चाहते हैं, तो उसके लिए सबसे उचित समय जुलाई और अगस्त का महीना है जिस समय बरसात का मौसम होता है।
सिंचाई
बता दें कि इसकी सिंचाई गर्मी के दिनों में 5 से 7 दिन में लगभग डेढ़ – दो घंटे तक करनी चाहिए। लेकिन आम दिनों में इसकी रेगुलर सिंचाई की जाती है।
कब तक आते हैं फल
यहां जानकारी के लिए बता दें कि ताइवान अमरुद की खेती में कम से कम 3 बार फल लगते हैं, परन्तु वह इसकी फसल को केवल नवम्बर के महीने में ही लेते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि उनकी फसल में जुलाई तक फल आ जाते हैं जो कि नवम्बर तक पाक जाते हैं और वह आगे फरवरी या मार्च तक चलता है।
कीटों से बचाव
अपने फलों को कीटों से बचाने और मक्खी नियंत्रण करने के लिए जितेंद्र फोरमैन ट्रैप और स्टिकी ट्रैप का इस्तेमाल करते हैं। फोरमैन ट्रैप से एक प्रकार की गंध निकलती है जो मक्खियों को आकर्षित करती है, और स्टिकी ट्रैप में एक चिपचिपा सा पदार्थ लगा हुआ होता है जिससे अगर कीट उनसे चिपकते हैं तो वह फिर मर जाता है।
ताइवान अमरुद की खासियत
1. यह फल अगर आप तोड़ कर रख लेंगे तो 8 दिनों तक भी खराब नहीं होता है।
2. ताइवान अमरुद की खेती से 6 महीने से 12 महीने पश्चात ही फल मिलने लग जाते हैं।
3. यह खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है और इसका रंग अंदर से हल्का गुलाबी होता है।
4. साथ ही बता दें की इसका वजन 300 ग्राम से लेकर 800 ग्राम तक हो जाता है।
5. बरसात के मौसम में दूसरे अन्य फल पकने लगते हैं लेकिन बारिश होने पर भी यह फल पकता नहीं है।
मौजूदा समय में ताइवानी अमरुद की मांग दिल्ली के आलावा उत्तर प्रदेश और अन्य दूसरे राज्यों में भी काफी अधिक बढ़ गयी है। सीजन में यह 40 रुपये किलो के भाव से बिकता है। लेकिन जब इसका सीजन चला जाता है तो फिर यह 25 रुपये किलो से 30 रुपये किलो के भाव से बिकता है।
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कोरोना काल में रोग प्रति-रोधक क्षमता बढ़ाने के लिए औषधीय पौधे का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ‘एनबीटी जड़ी-बूटी ‘ अभियान में ऐसे औषधीय पौधों की पूरी जानकारी मिलेगी, ताकि आप इनका आसानी से इस्तेमाल कर सकें और अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकें। इसके तहत आज गिलोय से जुड़ी हर जानकारी आपको मिलने वाली है।
गिलोय, एक औषधीय पौधा है जो इन दिनों कोरोना की वजह से ज्यादा चर्चा में है और लोग इसका इस्तेमाल भी अभी खूब कर रहे हैं। इम्यून सिस्टम को स्ट्रांग करने और लिवर से जुड़ी बीमारियों में काफी असरदार गिलोय के बारे में हर घर में बाते हो रही हैं। जब से कोरोना का संक्रमण फैला है और इससे बचाव के लिए काढ़ा भी लाभकारी बताया गया है, तब से गिलोय का सेवन हर कोई कर रहा है। न केवल आयुष मंत्रालय बल्कि पीएम मोदी जी ने भी काढ़ा पीने की अपील की है और गिलोय का काढ़ा में इस्तेमाल भी खूब हो रहा है। इसीलिए आज हम आपको इस मेडिसिनल प्लांट से जुड़ी हर जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। आप अपने किचन गार्डन और बालकनी के गमले में इसे लगा सकते हैं और रोजगार की इच्छा रखते हैं तो इसकी खेती भी कर सकते हैं।
गिलोय का वानस्पतिक नाम टोनोस्पोरा कार्डियोफेलिया है, जिसे आयुर्वेद में गिलोय के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में इसे अमृता कहा जाता है, क्योंकि यह कभी नहीं मरता है। गिलोय भारतीय मूल की बहुवर्षीय बेल है। इसके बीज काली मिर्च की तरह होते हैं। इसे मई और जून में बीज या कटिंग के रूप में बोया जा सकता है। मानसून के वक्त यह तेजी बढ़ता है। इसे बहुत धूप की जरुरत नहीं होती है। कई प्रदेशों में इसकी खेती होती है।
कोविड- 19 से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए गिलोय का इस्तेमाल हो रहा है। लोग पाउडर, जूस और काढ़े के रूप में इसका इस्तेमाल कर रहें हैं। इसके पत्ते और तना दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। इसे घर के गमलों, किचन गार्डन, टेरेस गार्डन और बगीचे में आसानी से लगाया जा सकता है। इन सभी जगहों पर गिलोय की बेल आसानी से फैल सकती है। इसका तना ऊँचा चढ़ता है तथा हवा से नमी लेता है। फसल के तौर पर इसे तैयार होने में करीब 10 महीने लगते हैं। एक हेक्टेयर में इसकी खेती कर 60 से 70 हजार का मुनाफा हो सकता है।
गुणों की खान है गिलोय
गिलोय की खासियत के कारण इसके कई नाम हैं। मसलन, अमृता, गुडची, गुणबेल
यह एंटी बैक्टीरियल, एंटी एलर्जिक, एंटी डायबिटीज़ और दर्द निवारक होता है।
इसके तने को जूस, पाउडर, टेबलेट,काढ़े या अमृतारिष्ट के रूप में लेने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
जिन लोगो की इम्युनिटी कम हो, उन्हें गिलोय का सेवन करने की सलाह दी जाती है।
यह ऑटो इम्यून डिसार्डर, बुखार, हाथ पैर की जलन, शरीर दर्द, डायबिटीज, लाइफ स्टाइल डिसार्डर और पेशाब की जुड़ी समस्याएँ दूर करने में काम आती हैं।
गिलोय का रोजाना इस्तेमाल बीमारियों से दूर रखता है। कोई बीमारी हो भी जाये तो इलाज के दौरान भी इसका सेवन ज्यादा प्रभावकारी होता है।
फाइबर और प्रोटीन भी
गिलोय में 15.8 % फाइबर होता है। इसके साथ 4.2 से 11.2 % तक प्रोटीन, 60 फीसदी कार्बोहाइड्रेड और 3 फीसदी से कम फैट मिलता है। इसके आलावा पोटैशियम, आयरन और कैल्शियम भी होते हैं।
कैसे करें इस्तेमाल
आयुर्वेद के मुताबिक, गिलोय के तने का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए 5 से 6 इंच लम्बा और अंगूठे के बराबर मोटा तना लें। पानी मिलाकर इसे कूटें और रस निकल लें। इस रस को रोजाना 10 से 20 मिली इस्तेमाल किया जा सकता है।
काढ़े के इस्तेमाल के लिए तने को चार गुने पानी लेकर उबाल लें। काढ़ा आधा या चौथाई रह जाये तो उसे छान कर पी लें।
पाउडर के तौर पर इस्तेमाल के लिए गिलोय के तने छाँव में सूखा लें। फिर कूट लें। इसके बाद मिक्सर में पाउडर बना लें और कपड़े से छान लें।
बाजार में गिलोय की गोलियाँ भी मिलती हैं। वैद्य या चिकित्सक की सलाह पर इनका सेवन कर सकते हैं।
बाजार में अमृतारिष्ट भी आता है। इसे भोजन के बाद आधा कप पानी के साथ ले सकते हैं। इसके अलावा अमृतादि गुग्गुल का भी फार्मुलेशन मिलता है।
लागत 15 से 20 हजार
गिलोय को अमूमन फलों के बाग में उगाया जाता है। खेतों में उगाने पर लागत थोड़ी बढ़ जाती है। सहफसली के तौर पर एक हेक्टेयर में 15 से 20 हजार और खेत में 30 से 40 हजार की लागत लगती है। एक हेक्टेयर खेत में करीब 2500 कटिंग की जरुरत पड़ती है। इसकी कटिंग 3 मीटर की दूरी पर लगनी चाहिए और गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए। मई जून में कटिंग लगाने के बाद फरवरी मार्च में इसके तने इस्तेमाल के लायक हो जाते हैं। एक हेक्टेयर में 10 से 8 कुन्टल तना मिलता है। इसकी कीमत 23 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम होती है। दिल्ली की नर्सरी में आमतौर पर गिलोय उगाया जाता है। दिल्ली सरकार की नर्सरी में गिलोय निःशुल्क लिया जा सकता है जबकि आमतौर पर गिलोय की बेल गमले में लगाने के लिए लगभग 30 से 50 रुपये में मिल जाती है। कोरोना काल में खुदरा मार्केट में यह कहीं-कहीं 100 रुपये तक भी बिक रहा है। इसकी मांग लगभग दो गुनी हो चुकी है।
गिलोय के बीज एक घंटा पानी में भिगो दें। थाली जैसे किसी बर्तन में, मिटटी, खाद और मौरंग के मिश्रण की 2 से 3 इंच मोटी परत लगायें। बीज बोयें और 2 से 3 इंच का फासला रखें। फिर हल्के पानी का छिड़काव कर दें। पौधा निकल आये तो दूसरे गमले में लगा दें।
कटिंग वही रोपें, जहाँ गांठ हो
कटिंग रोपने के लिए पेंसिल के बराबर मोठे तने का इस्तेमाल करें, जिसमें गांठें हो। एक तने की लम्बाई एक बालिश तक लें। ऊपर से तिरछा और नीचे से गोल रखें। कटिंग को गोल वाले हिस्से को जमीन, गमले या थैले में दबा दें। गांठ से नए कल्ले निकल आएंगे।
गिलोय सत्व से भी अच्छी कमाई
बाजार में गिलोय सत्व की भी खूब डिमांड है। ऐसे में यह भी कमाई का अच्छा जरिया बन सकता है। सत्व निकालने के 20 किलो गिलोय का तना इकट्ठा करें। इसके छोटे-छोटे टुकड़े करें। एक बार पानी में साफ कर दुबारा इसका पानी निकाल लें। छाने गए पानी को रात भर छोड़ दें। नीचे स्टार्च जमा हो जायेगा। अगले दिन ऊपर का पानी हटा दें। फिर नीचे जमा सत्व को सूखा लें। लगभग 5 किलो गिलोय में 100 ग्राम सत्व निकलता है। बाजार में इसकी कीमत करीब 8000 रुपये किलो तक है।