गूलर के पेड़ के विविध नाम :
उदुम्बर, उडुम्बर, कालस्कन्ध, जन्तुफल, पवित्रक, पाणिमुख, पुष्पशून्य, पुष्पहीना, ब्र्हावृक्ष, यज्ञसार, यज्ञफल, सदाफल, सौम्य, हेमदुग्धक, हेमदुग्ध, क्षीरवृक्ष।
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गूलर के पेड़ का सामान्य परिचय :
गूलर एक सर्वसुलभ वृक्ष है, जो कहीं भी देख जा सकता है।सामान्य जनता इसे बहुत ही साधारण और अनुपयोगी समझती है लेकिन सच्चाई तो यह है कि -यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी वृक्ष है।
गूलर के पेड़ के स्वरूप :
यह भारी भरकम होता है। गूलर में झरबेरी के बराबर फल लगते हैं जो क्रमश : बढ़ते हुये नीबू के बराबर तक हो जाते हैं। ये फल कच्ची अवस्था में हरे और पकने पर लाल हो जाते हैं। पके फल -मीठे, पौष्टिक,ठण्डे और पाचक होते हैं लेकिन यहाँ पर सावधानी रखने की बात यह है कि -प्रायः छोटे -छोटे उड़ने वाले पतंगा (भुनगे )-गूलर के फलों में छेद करके अन्दर तक घुस जाते हैं और उसका रस चूसा करते हैं। अतः गूलर खाने वाले को यह सावधानी बरतनी पड़ती है कि वे छेददार फल न ले। कोई भी फल कहने के पहिले उसे तोड़कर भीतर भली -भाँति देख लें कि कहीं उसके अन्दर कोई पतंगा तो नहीं बैठा है। यदि पतंगा बैठा हुआ है तो उसे निकलकर फेंक दें और तब ही उस फल को खायें। कच्चे गूलर में पतिंगे नहीं होते हैं। बहुत से लोग कच्चे गूलर की पकौड़ी बनवाकर बड़े चाव से कहते हैं।
गूलर के पेड़ के गुण- धर्म :
इसकी लकड़ी जल में सड़ती नहीं है, अतः कुँआ बावने वाले लोग ईंटों की दीवार खड़ी करने के पूर्व आधार रूप में नींव के स्थान पर गूलर की लकड़ी का एक गोल पहिया जैसा बिठा देते हैं -उसी के ऊपर ईंटें जमाकर गोलाकार दीवार खड़ी की जाती है। इस प्रकार नींव में गूलर की वह लकड़ी बहुत -बहुत लम्बे समय तक पानी में पड़ी रहने पर भी सड़ती नहीं है।
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